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इसराइली जो बरसती मिसाइलों के बीच रह रहे

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ग़ज़ा सिटी पर हो रही बमबारी से बचने के लिए उनके परिवार के तमाम लोगों ने अल-अहली हॉस्पिटल में पनाह ले रखी थी. ये पिछले साल अक्टूबर की बात है.इसराइली जो बरसती मिसाइलों के बीच रह रहे हैं

लयान के घरवाले अस्पताल पर हुई बमबारी की जद में आ गए थे. उस रात लयान के परिवार के 35 लोगों ने बमबारी में अपनी जान गंवाई थी. इनमें लयान और सिवार के अम्मी-अब्बू और पांच भाई-बहन शामिल थे.

वो बताती हैं, “हमारे परिवार को अस्पताल पहुंचे आधे घंटे ही हुए थे तभी दो मिसाइलों ने हम पर क़हर बरसा दिया. मेरी आंख खुली तो मैंने पाया कि मेरा पूरा परिवार ख़ाक़ में मिल गया है.”

ग़ज़ा शहर के उस भीड़भाड़ भरे अस्पताल पर हुई बमबारी में सैकड़ों लोग मारे गए थे. इसके लिए फलस्तीनी इस्लामिक जिहाद और इसराइल ने एक दूसरे को जिम्मेवार ठहराया था.

लयान और सिवार को अब अपनी एक आंटी और एक कज़न का सहारा है. इनके साथ उन्होंने दक्षिणी ग़ज़ा के रफ़ाह शहर में एक राहत शिविर में पनाह ले रखी है.

यूनिसेफ़ के अनुसार, ऐसा कोई राहत कैम्प नहीं है जहां अपने मां-बाप या दोनों में से किसी एक को खो देने वाले बच्चे न हों. लयान और उनकी 18 महीने की बहन सिवार ने इस जंग में अपने तमाम घरवालों को खो दिया है.
जंग की वजह से ये ईद बीते सालों की ईद जैसी नहीं है. हमने अपने घरवालों को खोया है.”

रफ़ाह के लयान की उम्र 11 साल है. ईद पर उनका दर्द उनकी बातों से महसूस किया जा सकता है.

एक तरफ़, दुनिया भर के मुसलमान ईद की तैयारियां कर रहे हैं तो ग़ज़ा के बच्चों का कहना है कि ईद की खुशी उनसे छीन ली गई है.इसराइल-हमास युद्ध के साये में ग़ज़ा के अनाथ बच्चों के लिए उदास करने वाली ईद है.

बच्चों के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी ‘यूनिसेफ़’ का कहना है कि ग़ज़ा की कुल विस्थापित आबादी का एक फ़ीसदी ऐसे बच्चे हैं जो या तो अनाथ हो गए हैं या फिर उनकी देखभाल के लिए कोई वयस्क नहीं है.

जंग में सब कुछ गंवा देने से पहले लयान ईद के मौके पर अपने मां-बाप के साथ नए कपड़े खरीदा करती थीं. ये ईद के लिए कुकीज़ बेक किया करते थे जिन्हें ग़ज़ा में स्थानीय लोग ‘मामूल’ कहते हैं. ईद पर पूरा परिवार इकट्ठा हुआ करता था और सब साथ में खुशियां मनाते थे.

लेकिन इस बरस ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा है. लयान कहती हैं, “इस बार ईद पर कोई हमारे घर नहीं आएगा.”

जंग की वजह से पैसों की तंगी है, हज़ारों लोगों के पास काम-धंधा नहीं है. लेकिन इन मुश्किल हालात में भी लयान के कज़न अली उनकी और सिवार की देखभाल कर रहे हैं. अली ने अपनी आर्थिक स्थिति के हिसाब से दोनों बहनों के लिए कपड़े और खिलौने खरीदे हैं.

ग़ज़ा सिटी के ज़ेतुन इलाके में 24 साल के अली अपने परिवार के 43 लोगों के साथ एक इमारत में रहा करते थे.

अब उनके परिवार के बचे हुए लोग दक्षिणी ग़ज़ा में एक टेंट में

फ़लस्तीन के सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ स्टैटिस्टिक्स की रिपोर्ट के अनुसार, ग़ज़ा में ऐसे बच्चों की संख्या 43 हज़ार से अधिक है जो अपने मां-बाप या फिर दोनों में से किसी एक अभिभावक को खो चुके