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रक्षाबंधन पर खेले जाने वाले बग्वाल खेल के दौरान, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी भी रहे मौजूद

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देहरादून: उत्तराखंड का प्रमुख पर्व बग्वाल गुरुवार को मनाया गया है। गुरुवार को चंपावत जिले में देवीधुरा के मां वाराही धाम में रक्षाबंधन के पर्व पर बग्वाल, जिसको पत्थरमार युद्ध कहते हैं, खेला गया है। प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी भी चंपावत में मौजूद रहे।
रक्षाबंधन पर खेले जाने वाले बग्वाल खेल के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी भी रहे। लोगों ने राखी बंधे हाथों से फूलों, फलों और पत्थरों की भी बौछार की। बग्वाल आठ मिनट तक खेला गया। इस दौरान 100 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। दो गंभीर घायलों को उच्च स्वास्थ्य केंद्र रेफर किया गया है। जहां दोनों का इलाज चल रहा है।
सुबह आठ बजे मंदिर के पंडित कीर्ति वल्लभ जोशी ने विशेष अनुष्ठान कराया। दोपहर सवा दो बजे शंखनाद के साथ चार खामों (समूह) फलों, फूलों, पत्थरों और लाठी-डंडों के साथ बग्वाल शुरू किया। करीब आठ मिनट तक बग्वाल खेला गया। पुजारी ने शंखनाद के साथ बग्वाल का समापन किया और बग्वाली वीरों को आशीर्वाद दिया। सीएमओ चंपावत डॉ. केके अग्रवाल ने बताया कि बग्वाल के दौरान 100 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं।

ऐसा माना जाता है कि, देवीधुरा में बग्वाल (Devidhura Bagwal Mela) का यह खेल पौराणिक काल से और कुछ लोग इसे कत्यूर शासन से चले आने की बात मानते हैं, जबकि कुछ अन्य लोग इसे काली कुमाऊँ से जोड़कर देखते हैं। हालांकि यह मेला कब से चला आ रहा है इस बात के कोई सटीक साक्ष्य नहीं हैं।

प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, पौराणिक काल में चार खामों (लमगड़िया, वालिग, गहड़वाल और चम्याल) के लोगों द्वारा अपनी आराध्या वाराही देवी को मनाने (खुश) के लिये नर बलि देने की प्रथा थी। मां वाराही को प्रसन्न करने के लिये चारों खामों के लोगों में से प्रति वर्ष एक नर बलि दी जाती थी। बताया जाता है कि, एक साल चमियाल खाम की एक वृद्धा के परिवार की नर बलि की बारी थी। जबकि वृद्धा के परिवार में केवल वृद्ध महिला और उसका पुत्र ही था। महिला ने अपने पुत्र की रक्षा के लिये माँ वाराही की स्तुति की। माँ वाराही ने वृद्धा को दर्शन दिये और मंदिर परिसर में चार खामों के बीच बग्वाल खेलने को कहा, तब से बग्वाल की प्रथा शुरू हुई। आज भी इस मेले के दौरान काफी लोगों को चोटें लगती हैं, लेकिन किसी भी तरह की कोई चिल्लाने की आवाज नहीं सुनाई देती है। कहा जाता है कि, जब एक व्यक्ति के बराबर खून बह जाता है तो प्रधान पुजारी शंख बजाकर इस बग्वाल की समाप्ति की घोषणा करता है, जिसके बाद सभी लोग एक दूसरे के गले मिलते हैं और एक दूसरे को बग्वाल मेले की बधाई देते हैं।
उत्तराखंड में अधिकतर मेले देवी देवताओं के सम्मान में आयोजित किये जाते है, तो कुछ पौराणिक, सांस्कृतिक, व्यापारिक महत्त्व रखते हैं। देवभूमि उत्तराखंड में सैकड़ो मेलों का आयोजन किया जाता है, जिसमें लोक जीवन, लोक नृत्य, गीत और परंपराओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाती है। हरे भरे गढ़वाल और रंगबिरंगे कुमाऊ के मेलों में उत्तराखंड का सांस्कृतिक स्वरूप निखरता ह। धर्म, संस्कृति और कला के व्यापक सामजस्य के कारण उत्तराखंड में मनाए जाने वाले त्योहार और मेलों की प्रकृति बहुत ही कलात्मक होती है, बता दें यहाँ मेलों को ‘कौथिग’ भी कहा जाता है।