Home एंटरटेनमेंट सरोगेसी पर आधारित दुकान मूवी

सरोगेसी पर आधारित दुकान मूवी

16

‘दुकान’ कोई दो साल से बनकर तैयार फिल्म है। सरोगेसी कानूनों में इन दो साल में भी कई बदलाव हुए हैं। ये फिल्म उतनी कानूनी पचड़े वाली है भी नहीं, जितनी कि इसे बनाने की कोशिश की गई है। फिल्म की एक लाइन की कहानी बहुत मार्मिक है और वह ये कि अगर किसी दंपती का परिवार बढ़ाने के लिए अपनी कोख किराए पर देने वाली मां को अपने गर्भ से जन्मने वाले बच्चे से प्यार हो जाए तो क्या होगा?  बच्चे से प्यार है या नहीं,  सिर्फ बच्चे को अपना दूध न पिला पाने की बात सुनकर सरोगेट मां भाग जाती है और कहीं दूर जाकर इस बच्चे को जन्म देती है। कहानी इसके बाद इस बच्चे के इसके कानूनी मां-बाप तक पहुंचने और इस दंपती के सरोगेट मां को अपने परिवार का हिस्सा मानने की जंग दिखाती है। लेकिन, इस मूल कहानी तक आने से पहले फिल्म सरोगेट मां का बचपन, किशोरावस्था और जवानी में ही अपने से तीन साल छोटी किशोरी की सौतेली मां बन जाने में इतनी खोई रहती है कि दर्शक फिल्म के मूल मुद्दे तक आने से पहले ही उकताने लगते हैं

सिद्धार्थ-गरिमा को हिंदी सिनेमा की कुछ ब्लॉकबस्टर फिल्मों के लेखन की महारत हासिल है। भंसाली की फिल्मों में दिखने वाली भव्य लोकपरंपराएं उन्होंने इस फिल्म में भी रखी हैं। हवा में उड़ती चुनरियां, जमीन पर बनी रंगोली, टॉप एंगल कैमरे से फिल्माए गए नृत्य दृश्य, गानों में सहायक कलाकारों के वस्त्रों की रंगीनियां और पार्श्वसंगीत के लिए कोरस और ढोल ताशों का इस्तेमाल दोनों को भंसाली का ‘कॉपी कैट’ बनाता चलता है। निर्देशन में सबसे जरूरी है फिल्म को इसकी कहानी के कालखंड के अनुसार परदे पर प्रस्तुत करना और समय के बदलाव के साथ किरदारों के रंग-रूप, देह भाषा और उठने, बोलने व चलने के अंदाज को बदलते रहना। इस मामले में सिद्धार्थ-गरिमा पूरी तरह असफल रहे हैं। उनकी कहानी एक खास सुर को पकड़कर शुरू होती है अरिजीत ने एक गाना विशेष धन्यवाद पाकर फिल्म के लिए गाया है। समीर तन्ना, अर्श तन्ना और तमन्ना तन्ना की कोरियोग्राफी बस ‘मैं तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली हूं’ में ही अपनी लय-ताल पाती दिखती है। तकनीकी तौर पर फिल्म ‘दुकान’ को संजय लीला भंसाली की तमाम फिल्मों की सस्ती कॉपी बनाने में इसके सिनेमैटोग्राफर अनिर्बान चटर्जी का बहुत बड़ा दोष है।