पिथौरागढ़: उत्तराखंड सरकार ने सीमांत जनपद पिथौरागढ़ के एक गांव का नाम बदलने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। थल तहसील क्षेत्र के “खूनी गांव” का नाम अब “देवीग्राम” कर दिया गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार ने बुधवार को अधिसूचना जारी कर इस नाम परिवर्तन को आधिकारिक रूप से लागू कर दिया।
सरकार ने आदेश में कहा कि यह फैसला ग्रामवासियों की भावनाओं और उनकी लंबे समय से चली आ रही मांग को ध्यान में रखकर लिया गया है। वर्षों से यहां के लोग गांव के नाम को बदलने की मांग कर रहे थे।
सांसद ने जताई खुशी
अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ संसदीय क्षेत्र से भाजपा सांसद अजय टम्टा ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “स्वतंत्रता के इतने साल बाद खूनी ग्राम का नाम देवीग्राम कर दिया गया है। यह केवल नाम परिवर्तन नहीं बल्कि हमारी संस्कृति, आस्था और लोकभावनाओं का सम्मान है।”
गांव की पहचान पर कलंक जैसा था नाम
करीब 380 की आबादी और 60 परिवारों वाला यह गांव लंबे समय से एक अजीब स्थिति का सामना कर रहा था। ग्रामीणों का कहना है कि “खूनी” नाम अपने आप में नकारात्मक ध्वनि पैदा करता था। बाहरी लोग जब इस नाम को सुनते तो अक्सर चौंक जाते और गांव को लेकर गलत धारणा बना लेते। ग्रामीणों का मानना है कि इससे उनकी सामाजिक पहचान पर असर पड़ता था और गांव एक तरह से कलंकित सा लगता था।
आस्था से जुड़ा नया नाम
गांव के समीप स्थित देवी मंदिर स्थानीय आस्था का केंद्र है। इसी कारण ग्रामीणों ने गांव का नया नाम “देवीग्राम” रखने का प्रस्ताव रखा था। उनका कहना है कि यह नाम उनकी धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा है और सांस्कृतिक दृष्टि से भी सकारात्मक संदेश देता है। अब गांव की पहचान आस्था, श्रद्धा और गर्व से जुड़े प्रतीक के रूप में होगी।
गांव में उत्सव जैसा माहौल
जैसे ही नाम बदलने की अधिसूचना जारी हुई, गांव में खुशी की लहर दौड़ गई। ग्रामीणों ने ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचकर और मिठाइयाँ बांटकर जश्न मनाया। बुजुर्गों ने इसे पीढ़ियों का सपना पूरा होने जैसा क्षण बताया। उनका कहना है कि वर्षों से इस मांग को सुनते आए थे और अब जाकर यह सपना साकार हुआ।
लंबे संघर्ष का परिणाम
ग्रामीणों के अनुसार वे कई बार जिला प्रशासन और सरकार से इस विषय को उठा चुके थे। हर बार उन्हें आश्वासन मिलता रहा, लेकिन अब जाकर उनकी मेहनत रंग लाई। गांव की नई पहचान से न केवल वहां पर्यटन और विकास की संभावनाएं बढ़ेंगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों में भी गर्व की भावना जगेगी.
राज्य सरकार ने इस निर्णय को सांस्कृतिक विरासत और लोकभावनाओं का सम्मान बताया है। सरकार का कहना है कि लोगों की भावनाओं और धार्मिक आस्थाओं का ध्यान रखते हुए इस तरह के फैसले लिए जाते रहेंगे।
