देहरादून: उत्तराखंड में शिक्षकों की सेवानिवृत्ति आयु को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा शिक्षकों की सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष किए जाने के बाद अब उत्तराखंड में भी उसी तर्ज पर उम्र बढ़ाने की मांग जोर पकड़ने लगी है। शिक्षक संगठनों और शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े लोगों का कहना है कि अनुभव और योग्यता का लाभ छात्रों को अधिक समय तक मिलना चाहिए।
शिक्षक संगठनों का कहना है कि अनुभव और दक्षता से परिपूर्ण शिक्षकों को समय से पहले सेवानिवृत्त करना शिक्षा व्यवस्था के हित में नहीं है। उनका तर्क है कि 60 वर्ष की उम्र में शिक्षक पूरी तरह सक्षम होते हैं और छात्रों को बेहतर मार्गदर्शन देने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
शिक्षकों की कमी से जूझ रहा राज्य
राज्य के कई सरकारी स्कूलों में पहले से ही शिक्षकों के पद खाली हैं। ऐसे में शिक्षकों की समय से पहले सेवानिवृत्ति से पढ़ाई प्रभावित हो रही है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सेवानिवृत्ति आयु दो वर्ष बढ़ाई जाती है, तो इससे स्टाफ की कमी काफी हद तक दूर हो सकती है और शिक्षा की गुणवत्ता भी बनी रहेगी।
यूपी के फैसले से बढ़ी उम्मीदें
उत्तर प्रदेश सरकार ने शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से शिक्षकों की सेवा अवधि 62 वर्ष तय की है। इसी फैसले को आधार बनाकर उत्तराखंड में भी समान नीति लागू करने की मांग उठ रही है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि जब पड़ोसी राज्य में यह व्यवस्था सफल हो सकती है, तो उत्तराखंड में भी इसे लागू किया जाना चाहिए।
सरकार के फैसले का इंतजार
फिलहाल राज्य सरकार की ओर से इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन शिक्षा विभाग स्तर पर इस पर मंथन शुरू होने की चर्चाएं हैं। माना जा रहा है कि सरकार सभी पहलुओं पर विचार कर जल्द ही कोई निर्णय ले सकती है।
छात्रों और अभिभावकों को होगा लाभ
शिक्षकों की सेवा अवधि बढ़ने से छात्रों की पढ़ाई में निरंतरता बनी रहेगी। अभिभावकों का भी मानना है कि अनुभवी शिक्षक बच्चों के शैक्षणिक और मानसिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में यह फैसला शिक्षा व्यवस्था के साथ-साथ छात्रों के भविष्य के लिए भी लाभकारी साबित हो सकता है।
