सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, दिव्यांगों पर टिप्पणी के लिए कॉमेडियंस से मांगी सार्वजनिक माफी
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार (Article 19) किसी भी स्थिति में जीवन और गरिमा के अधिकार (Article 21) से ऊपर नहीं हो सकता। सोमवार को अदालत ने पांच प्रसिद्ध कॉमेडियंस – समय रैना, विपुल गोयल, बलराज घई, सोनाली ठक्कर और निशांत तंवर – को दिव्यांगजनों पर असंवेदनशील मजाक करने के मामले में फटकार लगाई और अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगने का आदेश दिया।
याचिका के पीछे की कहानी
यह मामला SMA क्योर फाउंडेशन की ओर से दाखिल याचिका से जुड़ा है। फाउंडेशन ने कोर्ट से आग्रह किया कि दिव्यांगों का मजाक बनाने पर रोक लगाई जाए और ऐसे मामलों में ठोस दिशा-निर्देश तैयार किए जाएं। याचिका में कहा गया कि दिव्यांगों को कॉमेडी के नाम पर निशाना बनाना उनके सम्मान और अधिकारों का उल्लंघन है।
जस्टिस सुर्या कांत और जस्टिस जॉयमलया बागची की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए कहा – “जो अपमान किया गया है, उसके मुकाबले पछतावे की भावना ज्यादा होनी चाहिए। यह दंड का एक रूप है।
कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: “हास्य किसी की कीमत पर नहीं
सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ कहा कि हास्य जीवन का अहम हिस्सा है, लेकिन यह किसी के सम्मान और संवेदनाओं की कीमत पर नहीं होना चाहिए। जस्टिस कांत ने कहा – “हम खुद पर हंसते हैं, लेकिन जब हम दूसरों पर हंसने लगते हैं और संवेदनशीलता का उल्लंघन करते हैं, तब यह समस्या बन जाती है। आजकल के इन्फ्लुएंसर्स को ध्यान रखना चाहिए कि उनके जोक्स किसी पर चोट न पहुंचाएं, खासकर तब जब वे इसे एक व्यापार के रूप में पेश कर रहे हों।
कॉमेडियंस की माफी और कोर्ट का नजरिया
सुनवाई में SMA क्योर फाउंडेशन की ओर से पेश सीनियर वकील अपराजिता सिंह ने बताया कि कॉमेडियंस ने अपनी गलती स्वीकार की है और माफी भी मांग ली है। इस पर कोर्ट ने कहा कि माफी महज़ औपचारिकता न होकर सच्चे पछतावे का प्रतीक होनी चाहिए।
कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि कलाकारों को अब केवल माफी तक सीमित न रहकर अपने प्लेटफॉर्म्स पर दिव्यांगजनों के अधिकारों और उनकी समस्याओं पर जागरूकता फैलानी चाहिए। जस्टिस कांत ने कहा – “अपने पॉडकास्ट या चैनल पर माफी मांगें, जागरूकता फैलाने वाले सुझाव पर विचार करें और फिर बताइए कि आप कितना खर्च या जुर्माना वहन करने को तैयार हैं।
आईटी एक्ट के तहत सजा का संकेत
जस्टिस कांत ने यह भी कहा कि यदि किसी व्यक्ति के कारण दिव्यांगजनों का अपमान होता है तो ऐसे मामलों में आईटी एक्ट के तहत दंड का प्रावधान होना चाहिए। अदालत ने फिलहाल कॉमेडियंस को व्यक्तिगत रूप से पेश होने की छूट दी, लेकिन स्पष्ट कर दिया कि अगली सुनवाई में यह तय किया जाएगा कि इन्हें कितनी सजा या दंड दिया जाए।
अटॉर्नी जनरल का पक्ष
भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि वे इस मामले में दिशा-निर्देशों का ड्राफ्ट तैयार कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पूरी तरह से प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता, लेकिन इसे जिम्मेदारी के साथ निभाना होगा।
अभिव्यक्ति बनाम गरिमा का संतुलन
यह मामला सिर्फ कॉमेडी तक सीमित नहीं है, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा के अधिकार के बीच संतुलन को लेकर एक बड़े विमर्श का हिस्सा है। अदालत ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आवश्यक है, लेकिन यह स्वतंत्रता तब तक सार्थक है जब तक इससे किसी अन्य व्यक्ति की गरिमा और अधिकारों को ठेस न पहुंचे।
कोर्ट की यह टिप्पणी सिर्फ इन कॉमेडियंस तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के उन तमाम लोगों के लिए भी है जो सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बड़ी संख्या में अपने विचार साझा करते हैं। आज के दौर में ‘इन्फ्लुएंसर्स’ और कंटेंट क्रिएटर्स के पास करोड़ों लोगों तक पहुंच होती है। ऐसे में उनकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे अपने शब्दों और जोक्स का इस्तेमाल सोच-समझकर करें।
