विकासनगर: देहरादून जनपद के जौनसार-बावर क्षेत्र में परंपरा और लोक संस्कृति से जुड़ा अनोखा त्योहार बूढ़ी दीपावली धूमधाम से मनाया जा रहा है। पर्व की शुरुआत ग्रामीणों द्वारा भीमल की लकड़ी से बनाई गई होले (मशाल) जलाकर की गई, जिसके साथ ढोल–दमाऊ की थाप पर लोक गीतों और नृत्यों की खुशियों ने पूरे क्षेत्र को उत्सवमय बना दिया।
मुख्य रूप से जनजातीय समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला यह पर्व अपनी इको-फ्रेंडली परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। जहां आमतौर पर दीपावली आतिशबाज़ी और रोशनी से सजती है, वहीं जौनसार-बावर के लोग प्रकृति-सम्मत तरीके से सामूहिक रूप से बूढ़ी दीपावली मनाते हैं। ग्रामीण सुबह से ही भीमल की पतली लकड़ियों से मशालें तैयार करते हैं और फिर पंचायत आंगन में एकत्र होकर देवताओं का स्मरण करते हुए होले पर्व का आगाज करते हैं।
होले की रस्म के बाद गांवों के पंचायत आंगन लोकगीतों, हारूल नृत्य और उत्सव की उमंग से जगमगा उठते हैं। इस पर्व का उत्कृष्ट पक्ष यह है कि पांच दिनों तक चलने वाले इन आयोजनों में किसी भी प्रकार की आतिशबाजी नहीं होती। अखरोट और चिवड़ा इस पर्व के मुख्य प्रसाद माने जाते हैं, जिन्हें सबसे पहले इष्ट देव को अर्पित किया जाता है।
जौनसार-बावर के कई खत पट्टियों में यह परंपरा आज भी जीवंत है। कुछ पट्टियों में देशभर के साथ दीपावली मनाई जाती है, जबकि जहाँ चालदा महासू देवता का प्रवास माना जाता है, वहाँ बाद में सामूहिक रूप से बूढ़ी दीपावली मनाई जाती है। पर्व के एक माह बाद मनाए जाने को लेकर लोक कथाओं में विविध मान्यताएँ प्रचलित हैं। एक प्रमुख मान्यता के अनुसार, जब भगवान श्रीराम 14 वर्ष का वनवास पूर्ण कर अयोध्या लौटे, तो इसकी खबर देरी से पहाड़ों तक पहुँची। जानकारी मिलने पर लोगों ने एक महीने बाद दीपावली का उत्सव मनाया और तभी से यह परंपरा चलती आ रही है।
बूढ़ी दीपावली के दौरान नौकरी-पेशा लोग भी अपने पैतृक गांवों में लौट आते हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में सामुदायिक मेलजोल, लोक-संस्कृति और सामूहिक आनंद का अनूठा दृश्य देखने को मिलता है। इस पर्व ने एक बार फिर दिखाया कि जौनसार-बावर की लोक-संस्कृति और पारंपरिक उत्सव आज भी जीवंत और प्रभावशाली हैं।
