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कैलाश बहुखण्डी ‘जीवन’

अधिकाॅंश कदम
निर्णायक न थे
गड-मड होकर
समय के अनुरूप
न पा अँधियारे कूप
में जा गिरे।
भाग्य यदि होता है कुछ
रहा चिढ़ाता सदैव मुँह, बिखरते स्वप्नों का
कौतूहल का
बना हो जैसे साक्षी मात्र ।
ये शायद विडम्बना ही थी कि उदासी
जीवन में घर कर गई मुस्कराहट होठों में
आने से पूर्व
छिन गई, बुझ रह गई ठगी,
स्थिर …।

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