न्यूज डेस्क| मकर संक्रांति(Makar Sakaranthi) हिंदु धर्म के त्योहारों में नई शुरुआत के लिए महत्वपूर्ण है. दक्षिण दिशा की ओर गति पूरी होने के बाद इस दिन उत्तर दिशा की ओर बढ़ने लगते हैं. इस पर्व का जिक्र महाभारत(MAhabharata) में भी किया गया है. पितामह भीष्म(Pitamah Bhishma) ने 58 दिन शरसय्या( Bed of Arrows) पर कष्ट सहने के बाद प्राण त्याग किए थे. हालांकि पितामह भीष्म के देहत्याग पर मत यह भी है कि मकर संक्रांति पर उन्होंने देहत्याग करने का समय चुना था और 8 दिन बाद जिसे माघ शुक्ल अष्टमी कहा जाता है, के दिन प्राण त्याग कर मोक्ष की प्राप्ती की थी. पितामह भीष्म के बिना महाभारत की कल्पना मुश्किल है. विभिन्न महत्वपूर्ण निर्णय और भीष्म प्रतिज्ञा के कारण ही महाभारत की गाथा अपने अंतिम चरण तक पहुंच पाई थी.
पितामह भीष्म ज्योतिष और वेद-वेदांगों के ज्ञाता थे. भगवद् गीता के आठवें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण(Lord Krishna) ने कहा है कि उत्तरायण के समय में जो भी देहत्याग करते हैं वे जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाते हैं जबकि दक्षिणायण के समय प्राण त्यागने पर पुनः जन्म लेना पड़ता है.
अग्निर्ज्योतिरह: शुक्ल: षण्मासा उत्तरायणम् |
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जना: || 24||
धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण: षण्मासा दक्षिणायनम् |
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते || 25||
सारांश – ” वे जो ब्रह्म का ज्ञान रखते हैं और उत्तरायण के 6 महीने के समय में शरीर त्यागते हैं, वे मोक्ष प्राप्त करते हैं व वे ज्ञानी लोग जो वेदों(Vedas) का अध्यन करते हैं व दक्षिणायण पर्व पर शरीर त्यागते हैं वह कुछ समय स्वर्ग के सुख भोगकर पुनः जन्म लेते हैं.
