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उत्तराखंड शिक्षा व्यवस्था का गजब हाल!..टपकती छत है, दीवारें दरक रही हैं, फिर भी बच्चे शिक्षा की लौ जलाए बैठे हैं

जहां सरकार ने मुंह मोड़ा, वहां बच्चों ने उम्मीद नहीं छोड़ी।
12  साल से जर्जर छतों के नीचे चलता है पढ़ाई का संघर्ष
 डीएम के निर्देश के बाद भी नहीं बन पाया टिनशेड
प्रधानाचार्य का पद खाली, सफाई का जिम्मा शिक्षकों पर

जागेश्वर (अल्मोड़ा): कभी मंदिरों की धरती के नाम से पहचाना जाने वाला जागेश्वर आज सरकारी उपेक्षा की जीती-जागती तस्वीर बन चुका है। यहां का राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, जो नाम से तो “उच्च” है, मगर हालात इतने बदतर हैं कि वहां पढ़ाई करना हर दिन एक खतरा उठाने जैसा है।

यहां पढ़ने वाले 62 छात्र-छात्राएं, हर सुबह किताबों से पहले टपकती छत और गिरी हुई दीवारों से जूझते हैं। बरसात के मौसम में हालात और भी भयावह हो जाते हैं। बच्चों को क्लासरूम के बजाय बरामदे में बैठाकर पढ़ाया जाता है, जहां न सुरक्षा है, न सुविधा।

स्कूल की छत साल 2013 से टपक रही है, और अब दीवारें भी कमजोर हो चुकी हैं। बच्चों के माता-पिता बार-बार प्रशासन से गुहार लगा चुके हैं, लेकिन जवाब सिर्फ आश्वासन ही रहे हैं। यहां कंप्यूटर और फर्नीचर तक को शिक्षक खुद प्लास्टिक में लपेट कर बचाते हैं, ताकि थोड़ी-सी टेक्नोलॉजी भी बची रह सके।

चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का न होना, सफाई व्यवस्था को पूरी तरह से प्रभावित कर रहा है। प्रधानाचार्य का पद सालों से खाली पड़ा है। नीतियों और योजनाओं की बातें तो बहुत होती हैं, मगर यहां बच्चे हर रोज अपनी जान जोखिम में डालकर पढ़ाई करने आते हैं।

कुछ समय पहले जब स्थानीय लोगों ने मिलकर डीएम आलोक कुमार पांडे से मिलकर शिकायत की, तो उन्होंने आपदा मद से 7 लाख रुपये मंजूर किए और आरईएस के जेई ने टिनशेड बनाने की बात कही। लेकिन महीनों बीत जाने के बावजूद एक अदद टिनशेड तक नहीं बन पाया। अब सवाल उठता है— जब तक नया भवन नहीं बनता, तब तक बच्चों की सुरक्षा कौन करेगा?

> “बरसात में स्कूल की छत से पानी का टपकना आम बात हो गई है। इन भवनों का ध्वस्तीकरण कर दो नये कक्ष बनाए जा रहे हैं।”
— पूरन चंद्र पांडे, प्रभारी प्रधानाध्यापक

> “विद्यालय का ध्वस्तीकरण किया जाएगा, इसके बाद नए कमरों का निर्माण होगा। छात्रों को कोई दिक्कत न हो, इसका पूरा ध्यान रखा जा रहा है।”
— अत्रेश स्याना, सीईओ, अल्मोड़ा

यह सिर्फ एक स्कूल की कहानी नहीं है, बल्कि उन बच्चों की हिम्मत की मिसाल है, जो सुविधाओं के अभाव में भी सपनों को जिन्दा रखे हुए हैं। ये बच्चे पढ़ाई छोड़ सकते थे, मगर उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी। यही जज़्बा आने वाले समय में बदलाव की नींव रखेगा— बशर्ते, व्यवस्था भी अब जाग जाए।

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