मानवी सज्वान…
जहाँ सपनों को मिलती है दिशा, दिव्यकीर्ति सर की प्रेरक कहानी
हर साल लाखों छात्र यूपीएससी की तैयारी करते हैं। यह परीक्षा सिर्फ किताबों की नहीं, बल्कि धैर्य, लगन और सोच की भी परीक्षा है। ऐसे में एक ऐसा नाम है, जिसने इस कठिन राह को आसान बनाया—डॉ. विकास दिव्यकीर्ति।
आज वे केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि मार्गदर्शक, विचारक और प्रेरणास्रोत बन चुके हैं। लेकिन यहाँ तक पहुँचने का सफर आसान नहीं था। आइए, उनकी जिंदगी की कहानी को कदम-दर-कदम समझते हैं।

बचपन.. हरियाणा की मिट्टी से निकली प्रतिभा
सन 1973 में हरियाणा के एक छोटे से कस्बे में विकास का जन्म हुआ। परिवार सामान्य था, लेकिन संस्कार और शिक्षा की नींव बहुत मजबूत थी।
गाँव के माहौल में पले-बढ़े विकास के अंदर बचपन से ही किताबों को पढ़ने और समझने का जुनून था। दोस्त खेलों में व्यस्त रहते, तो वे किताबों और कहानियों में डूबे रहते।
उनके पिता अक्सर कहते थे—
“बेटा, पढ़ाई जीवन को बदल देती है।”
और शायद यही वाक्य उनके जीवन का मूल मंत्र बन गया।
दिल्ली विश्वविद्यालय तक का सफर, साहित्य से आत्मा का रिश्ता
स्कूल की पढ़ाई खत्म होने के बाद विकास ने दिल्ली का रुख किया।
दिल्ली विश्वविद्यालय में उन्होंने हिंदी साहित्य विषय चुना। पढ़ाई में उनकी गहरी रुचि थी और साहित्य उनके लिए केवल विषय नहीं, बल्कि आत्मा का हिस्सा बन चुका था।
हिंदी भाषा की गहराई और सरलता ने उन्हें यह सिखाया कि जटिल विचारों को आम इंसान तक कैसे पहुँचाया जा सकता है। यही गुण बाद में उनकी शिक्षण शैली की पहचान बना।
UPSC की राह.. पहली कोशिश और जीत

साल था 1996। विकास ने ठान लिया कि वे UPSC (संघ लोक सेवा आयोग) की परीक्षा देंगे।
लाखों युवाओं की तरह वे भी इस परीक्षा की कठिनाई को जानते थे। लेकिन उनके भीतर आत्मविश्वास और लगन थी।
दिन-रात की मेहनत के बाद जब रिजल्ट आया, तो विकास ने सबको चौंका दिया।
वे पहले ही प्रयास में UPSC पास कर गए।
यह उपलब्धि बहुत बड़ी थी। आज भी यूपीएससी में पहली बार में सफलता मिलना एक दुर्लभ उपलब्धि है। उनका चयन गृह मंत्रालय में हुआ।
सरकारी नौकरी बनाम दिल की आवाज़
सरकारी नौकरी, स्थिर भविष्य, प्रतिष्ठा—यह सब अब उनके पास था। लेकिन कुछ महीनों बाद उन्होंने महसूस किया कि उनके मन को सुकून नहीं है।
विकास का दिल हमेशा पढ़ाने की ओर खिंचता था। वे विद्यार्थियों से जुड़ना चाहते थे, समाज के युवाओं को दिशा देना चाहते थे।
एक दिन उन्होंने तय कर लिया—
वे प्रशासनिक सेवा की नौकरी छोड़कर शिक्षा के क्षेत्र में कदम रखेंगे।
यह निर्णय आसान नहीं था। परिवार और समाज को समझाना पड़ा, लेकिन उन्होंने दिल की सुनी। यही वह मोड़ था, जिसने उन्हें “दिव्यकीर्ति सर” बना दिया।
दृष्टि आईएएस..एक सपना साकार हुआ

सन 1999। दिल्ली के करोल बाग में एक छोटी-सी इमारत से उन्होंने दृष्टि आईएएस की नींव रखी।
शुरुआत में छात्रों की संख्या कम थी। लेकिन विकास की शैली अनोखी थी।
वे कठिन विषयों को सरल उदाहरणों से समझाते।
किताबों से ज्यादा जीवन के अनुभव साझा करते।
छात्रों के साथ शिक्षक-छात्र नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य जैसा रिश्ता बनाते।
धीरे-धीरे उनकी कक्षाएँ भरने लगीं।
और देखते ही देखते दृष्टि आईएएस पूरे भारत में UPSC की तैयारी का सबसे भरोसेमंद संस्थान बन गया।
विद्यार्थियों के दिल में क्यों बसते हैं दिव्यकीर्ति सर?
1. सरलता : कठिन से कठिन विषय को आम भाषा में समझाना।
2. सहानुभूति : छात्रों की समस्याओं को समझना और उनका समाधान करना।
3. प्रेरणा : पढ़ाई के साथ जीवन जीने की कला सिखाना।
4. विश्वास : हर छात्र को यह महसूस कराना कि वह भी सफल हो सकता है।
5. साक्षात्कार गाइडेंस : उनकी Mock Interview क्लासेस छात्रों को असली UPSC इंटरव्यू का आत्मविश्वास देती हैं।
लेखन और साहित्य में योगदान
हिंदी साहित्य में गहरी पकड़ रखने वाले डॉ. दिव्यकीर्ति ने कई किताबें और स्टडी मटीरियल लिखा।
दृष्टि पब्लिकेशन से प्रकाशित उनकी किताबें आज लाखों छात्रों की तैयारी का आधार हैं।
उनके नोट्स और मैगज़ीन (Drishti Current Affairs) हर गंभीर अभ्यर्थी की डेस्क पर मिल जाते हैं।
डिजिटल शिक्षक.. यूट्यूब से गाँव-गाँव तक

समय के साथ उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म अपनाए।
Drishti IAS का YouTube चैनल शुरू हुआ।
आज उस पर करोड़ों व्यूज़ हैं।
गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों के छात्र, जो दिल्ली नहीं आ सकते, वे ऑनलाइन क्लास से लाभ उठा रहे हैं।
उनकी ऑनलाइन उपस्थिति ने शिक्षा को भौगोलिक सीमाओं से बाहर निकाल दिया.
डॉ. दिव्यकीर्ति मानते हैं—
“UPSC परीक्षा केवल किताबों की नहीं, बल्कि व्यक्तित्व की भी परीक्षा है।”
उनका विचार है कि एक अधिकारी तभी सफल है, जब उसमें मानवीय संवेदनाएँ और समाज की गहरी समझ हो।
वे छात्रों को बार-बार यह संदेश देते हैं—
“पढ़ाई करो, लेकिन इंसानियत कभी मत छोड़ो।”
संघर्ष और आलोचनाएँ

किसी भी बड़े व्यक्तित्व की तरह डॉ. दिव्यकीर्ति को भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा।
कभी उनकी किसी बात को गलत अर्थों में लिया गया, तो कभी सोशल मीडिया पर उन्हें निशाना बनाया गया।
लेकिन उन्होंने हमेशा संयम से जवाब दिया और अपने काम से आलोचकों को शांत किया।
छात्रों की कहानियों में उनकी झलक
कोई छात्र गाँव से आता है, पहली बार दिल्ली की गलियों में कदम रखता है और दृष्टि आईएएस से प्रेरित होकर IAS बनता है।
कोई साधारण किसान परिवार की बेटी उनकी कक्षाओं से मोटिवेट होकर प्रशासनिक अधिकारी बन जाती है।
इन सबकी सफलता की कहानियों में एक नाम हमेशा शामिल होता है—दिव्यकीर्ति सर।
हरियाणा के छोटे से गाँव से निकला यह लड़का आज भारत के लाखों युवाओं का मार्गदर्शक है।
डॉ. विकास दिव्यकीर्ति की कहानी यह सिखाती है कि—
सपने देखने की हिम्मत करो।
मेहनत और ईमानदारी से आगे बढ़ो।
और जब भी फैसला लो, तो दिल की सुनो।
उन्होंने दिखा दिया कि असली सफलता सिर्फ ऊँचे पद पाने में नहीं, बल्कि दूसरों की जिंदगी संवारने में है।

