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भागीरथी के प्रचंड वेग से खतरे में गंगोत्री की धरोहर, संरक्षण के लिए बायो-इंजीनियरिंग की मांग तेज

उत्तरकाशी: हिमालय की गोद में बसे पवित्र गंगोत्री धाम पर जलवायु परिवर्तन और प्रकृति के रौद्र रूप का खतरा लगातार गहराता जा रहा है। गोमुख ग्लेशियर के तेजी से पिघलने और मानसून के दौरान भारी वर्षा के कारण भागीरथी नदी का जलस्तर भयावह रूप से बढ़ रहा है, जिससे गंगोत्री के प्राचीन घाटों और ऐतिहासिक संरचनाओं पर संकट मंडरा रहा है।

हर वर्ष गर्मी और बरसात के मौसम में भागीरथी की तेज धारा घाटों को नुकसान पहुंचा रही है। नदी किनारों का कटाव और पत्थरों का धंसना अब आम समस्या बन चुकी है। स्थानीय लोगों और तीर्थ पुरोहितों का कहना है कि पहले गंगा का बहाव इतना उग्र नहीं होता था, लेकिन अब हालात लगातार गंभीर होते जा रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार गंगोत्री एक इको-सेंसिटिव जोन है, जहां भारी कंक्रीट निर्माण पर्यावरणीय संतुलन को बिगाड़ सकता है। ऐसे में केवल सुरक्षा दीवारें बनाना पर्याप्त नहीं होगा। पर्यावरणविद अब “बायो-इंजीनियरिंग” आधारित संरक्षण कार्यों की आवश्यकता बता रहे हैं, जिसमें प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण के अनुकूल तकनीकों से नदी किनारों को मजबूत किया जा सके।

गंगोत्री धाम के सचिव सुरेश सेमवाल ने कहा कि गंगोत्री के घाट केवल पत्थरों की संरचना नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो बढ़ता जलस्तर भविष्य में इस ऐतिहासिक धरोहर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।

उन्होंने सरकार से मांग की कि गंगा नदी के बीच जमा हो रहे मलबे को जल्द हटाया जाए ताकि नदी का प्रवाह संतुलित बना रहे और घाटों व मंदिर परिसर पर दबाव कम पड़े।

स्थानीय लोगों का मानना है कि मां गंगा को बचाने के लिए हिमालय और ग्लेशियरों का संरक्षण बेहद जरूरी है। गंगोत्री धाम की सुरक्षा अब केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन और सांस्कृतिक विरासत को बचाने की बड़ी चुनौती बन चुकी है।

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