‘120 बहादुर’ एक ऐसी वॉर फिल्म है जो एक्शन और इमोशन से भरपूर है, और जिसे देखते हुए गला भर आता है और आँखें नम हो जाती हैं। फ़िल्म में फरहान अख्तर मेजर शैतान सिंह भाटी का दमदार किरदार निभाते हैं—संयम, शौर्य और दृढ़ता के साथ।
कहानी…
26 नवंबर 1962। चूशुल घाटी, लद्दाख।
सिर्फ 120 भारतीय सैनिक, और सामने 3000 चीनी सैनिकों की बटालियन।
यह था रेजांग ला का युद्ध—जहाँ 13 कुमाऊँ रेजिमेंट की चार्ली कंपनी के बहादुर जवानों ने दुश्मन को रोके रखा, अपनी जानें देकर देश की एक महत्वपूर्ण चौकी बचा ली। अंत में मात्र छह सैनिक ही जीवित लौट पाए।
फिल्म का ट्रीटमेंट
फरहान अख्तर का प्रदर्शन शानदार है। वे अपने जवानों को ‘जंग’ की ओर ले जाते हुए एक ऐसे नेता की तरह दिखते हैं जिसके लिए वापस लौटना विकल्प नहीं है। फिल्म में एक्शन और भावना दोनों का संतुलन है। यह सामान्य बॉलीवुडीय ड्रामा में डूब सकती थी, लेकिन निर्देशक रजनीश घई इसे संतुलित रखते हैं।
1964 की फिल्म ‘हकीकत’ की तरह यह भी उसी युद्ध को दर्शाती है, लेकिन इसमें सैनिकों की आपसी पहचान—उनकी एक ही बोली, एक ही मिट्टी—को अधिक उभारा गया है। ‘दादा किसान की जय’ का नारा उनके आपसी जुड़ाव को दर्शाता है। जिन दो साथियों की नोकझोंक दिखाई जाती है, उनका युद्ध में एक-दूसरे से लिपटे हुए शहीद होना पहले ही संकेतित कर दिया जाता है।
फिल्म की खूबियाँ
अंतिम एक घंटा बेहद दमदार है—लगातार चलती लड़ाई, गोलीबारी, हाथापाई और बलिदान का प्रभावी चित्रण।
‘120 बहादुरों’ की अपने जमीन और सरजमीन के लिए लड़ने की भावना आपको भीतर तक छूती है।
पहली बार फिल्म कर रहे कई कलाकार भी अपने किरदारों में विश्वसनीय लगते हैं।
सपरश वालिया का रेडियो ऑपरेटर वाला किरदार याद रह जाता है, भले ही उनका लहजा कहीं-कहीं डगमगाता है।
कमजोरियां..
जोधपुर स्थित मेजर शैतान सिंह और उनकी पत्नी (राशी खन्ना) की बैकस्टोरी कितनी सच्ची है, यह स्पष्ट नहीं।
होली का गाना रंगीन तो है, लेकिन कहानी की गति रोक देता है।
चीनी कमांडरों को कार्टूनिश, अत्यधिक आक्रामक तरीके से दिखाया गया है।
भारतीय कमांडरों का युद्ध की वास्तविकता पर संदेह करना अविश्वसनीय लगता है, खासकर जब वे खुद ही आदेश दे रहे होते हैं।
‘120 बहादुर’ अपने कमजोर हिस्सों के बावजूद दिल को छूने वाली और सम्मान जगाने वाली फ़िल्म है। यह वर्दी का मान, बलिदान का गर्व और मातृभूमि के लिए लड़ते सैनिकों की अटूट वीरता को सशक्त रूप से दिखाती है।
अंत तक आते-आते आपका गला भर आता है—और यही इस फिल्म की सबसे बड़ी जीत है।
