देहरादून: साइबर ठगों ने डिजिटल अरेस्ट का नया हथकंडा अपनाकर उत्तराखंड के एक रिटायर्ड कुलपति से 1.47 करोड़ रुपये की ठगी कर डाली। नैनीताल निवासी पीड़ित पूर्व कुलपति महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हैं। आरोपी ने खुद को महाराष्ट्र साइबर क्राइम विभाग का अधिकारी बताते हुए पीड़ित को 12 दिनों तक व्हाट्सएप कॉल के ज़रिए डिजिटल अरेस्ट में रखा। ठगी के इस मामले का खुलासा होते ही उत्तराखंड एसटीएफ ने कार्रवाई करते हुए आरोपी राजेंद्र कुमार को हिमाचल प्रदेश के सोलन से गिरफ्तार कर लिया है।
ऐसे हुआ डिजिटल अरेस्ट
पीड़ित रिटायर्ड कुलपति ने साइबर थाने में दर्ज शिकायत में बताया कि अगस्त महीने में उन्हें अज्ञात व्यक्तियों से व्हाट्सएप कॉल पर लगातार धमकी भरे संदेश और कॉल आने लगे। ठगों ने खुद को महाराष्ट्र पुलिस के साइबर क्राइम विभाग से बताते हुए कहा कि उनके नाम पर खुले बैंक खाते में 60 करोड़ रुपये का मनी लॉन्ड्रिंग हुआ है। आरोपी ने पीड़ित को आश्वस्त करने के बजाय डराने का काम किया। कॉल पर कहा गया कि कानूनी कार्रवाई से बचने और जांच में सहयोग के लिए उन्हें लगातार ऑनलाइन रहना होगा।
ठगों ने पीड़ित को यह कहते हुए डिजिटल अरेस्ट किया कि वह घर से बाहर नहीं जाएंगे और न ही किसी से संपर्क करेंगे। लगातार दबाव बनाकर उनसे अलग-अलग खातों में 1.47 करोड़ रुपये ट्रांसफर करा लिए गए।
पुलिस की जांच और गिरफ्तारी

पीड़ित की शिकायत पर उत्तराखंड एसटीएफ और साइबर पुलिस ने संयुक्त जांच शुरू की। जांच में जिन बैंक खातों और मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल हुआ था, उनका सत्यापन किया गया। इसी दौरान आरोपी राजेंद्र कुमार निवासी सोलन (हिमाचल प्रदेश) का नाम सामने आया। पुलिस ने दबिश देकर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।
एसटीएफ एसएसपी नवनीत भुल्लर ने बताया कि आरोपी ने फर्जी दस्तावेज और अन्य लोगों के बैंक खातों का इस्तेमाल किया। आरोपी के पास से मोबाइल फोन, वाई-फाई राउटर, बैंक खाते से जुड़े चेक और फर्म से संबंधित अन्य दस्तावेज बरामद हुए। पुलिस को पता चला कि जिन बैंक खातों का इस्तेमाल ठगी में हुआ, उनमें केवल जून से अगस्त महीने के बीच लाखों रुपये का लेनदेन हुआ था।
क्या है डिजिटल अरेस्ट?
साइबर अपराध की दुनिया में यह एक नया तरीका है। इसमें ठग खुद को पुलिस, सीबीआई, इनकम टैक्स या अन्य सरकारी अधिकारी बताते हैं। व्हाट्सएप, फोन कॉल या वीडियो कॉल के माध्यम से पीड़ितों को डराया-धमकाया जाता है। झूठे केस का हवाला देकर कहा जाता है कि उन्हें डिजिटल अरेस्ट किया गया है, यानी वे घर से बाहर नहीं जाएंगे और लगातार कॉल पर बने रहेंगे।
इस दबाव और डर के कारण लोग अपने बैंक खाते से ठगों द्वारा बताए गए खातों में बड़ी रकम ट्रांसफर कर देते हैं।
कैसे करें शिकायत?
विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया अस्तित्व में नहीं है। कोई भी सरकारी एजेंसी इस तरह से लोगों को डिजिटल अरेस्ट नहीं करती। अगर कभी ऐसा कॉल आता है तो तुरंत सावधान हो जाएं। इस तरह की घटनाओं की शिकायत cybercrime.gov.in पर दर्ज करें या फिर हेल्पलाइन 1930 पर कॉल करें।
यह मामला लोगों को साइबर ठगों की नई चाल से आगाह करता है। शिक्षित और जिम्मेदार लोग भी इन झांसे में आकर लाखों की ठगी का शिकार हो रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि लोग सतर्क रहें, अनजान कॉल या संदेशों पर भरोसा न करें और कानूनी कार्रवाई के नाम पर डरने के बजाय पुलिस की मदद लें।
