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उत्तराखंड: झाड़ियों में मिला नवजात बच्चे का शव, मॉर्निंग वॉक कर रहे व्यक्ति ने दी पुलिस को सूचना, जांच में जुटी पुलिस

ऋषिकेश:  समाज की संवेदनहीनता और टूटते मानवीय मूल्यों की एक और झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आई है। गुरुवार सुबह ऋषिकेश स्थित आईडीपीएल हॉकी मैदान के समीप मॉर्निंग वॉक कर रहे एक व्यक्ति को झाड़ियों से बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। पहले तो उसे भ्रम हुआ, लेकिन आवाज लगातार आने पर जब वह नजदीक पहुंचा तो उसने देखा कि झाड़ियों में एक नवजात बच्चा पड़ा हुआ है।

व्यक्ति ने तुरंत मामले की सूचना पुलिस को दी। कुछ ही देर में चीता पुलिस मौके पर पहुंच गई और बच्चे को तुरंत इलाज के लिए एम्स ऋषिकेश में भर्ती कराया गया। चिकित्सकों के अनुसार नवजात का जन्म एक से दो घंटे पूर्व हुआ था, यानी बच्चे को जन्म लेते ही किसी ने झाड़ियों में लाकर छोड़ दिया।

यह घटना न केवल दिल को दहला देने वाली है, बल्कि समाज में फैलती बेरुखी और असंवेदनशीलता की एक और बानगी भी है। एक मां का अपने ही बच्चे को झाड़ियों में छोड़ देना इस बात की ओर इशारा करता है कि कहीं न कहीं सामाजिक और पारिवारिक ढांचे में गहरी खामियां हैं, जिनका इलाज अब केवल कानून से नहीं, संवेदना और समझदारी से भी करना होगा।

पुलिस ने घटना की जांच शुरू कर दी है, लेकिन मौके के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरे खराब होने के कारण जांच को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। पुलिस स्थानीय लोगों से पूछताछ कर रही है और आस-पास के अस्पतालों व क्लीनिकों से भी जानकारी जुटाने की कोशिश कर रही है कि हाल ही में किसी महिला ने प्रसव कराया हो।

इस पूरे मामले ने समाज में महिलाओं के स्वास्थ्य, सुरक्षा और मानसिक स्थिति पर भी सवाल खड़े किए हैं। कहीं न कहीं यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहां एक मां को मजबूर होकर अपने ही नवजात को मरने के लिए छोड़ देना पड़ता है?

सरकार और सामाजिक संस्थाओं को मिलकर अब ऐसे मुद्दों पर गंभीरता से कार्य करने की आवश्यकता है। अनचाहे गर्भ, सामाजिक बदनामी और आर्थिक दबाव जैसी समस्याओं से जूझ रही महिलाओं के लिए काउंसलिंग, आश्रय गृह और मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं जरूरी हैं। फिलहाल बच्चा सुरक्षित है और चिकित्सकों की निगरानी में है। पुलिस उस महिला और संभवतः अन्य दोषियों की तलाश में लगी है, जिन्होंने यह अमानवीय कृत्य किया।

यह केवल एक बच्चा नहीं, हमारी संवेदनशीलता और मानवता की परीक्षा है। आज जरूरत है कि हम न सिर्फ कानून के सहारे न्याय की उम्मीद करें, बल्कि समाज को भी बदलें — ताकि किसी और बच्चे को झाड़ियों में जन्म के बाद रोना न पड़े।

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