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ज्ञानपीठ सम्मानित हिंदी साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल का निधन, 88 वर्ष की आयु में ली अंतिम सांस

रायपुर: ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात हिंदी साहित्यकार, कवि और उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल का मंगलवार को रायपुर में निधन हो गया। वह 88 वर्ष के थे। उनके निधन से हिंदी साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
एम्स रायपुर के जनसंपर्क अधिकारी लक्ष्मीकांत चौधरी ने बताया कि विनोद कुमार शुक्ल का निधन शाम 4:58 बजे हुआ। उन्होंने कहा कि मृत्यु का कारण मल्टीपल ऑर्गन इंफेक्शन और ऑर्गन फेल्योर रहा। शुक्ल को 2 दिसंबर को स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

इस वर्ष की शुरुआत में विनोद कुमार शुक्ल को हिंदी साहित्य में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए 59वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया था। यह पुरस्कार विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य में उत्कृष्ट योगदान देने वाले लेखकों को दिया जाने वाला देश का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान है। शुक्ल छत्तीसगढ़ से यह सम्मान पाने वाले पहले साहित्यकार थे।

प्रसिद्ध हिंदी लेखक, कवि और उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल अपनी सरल, संवेदनशील और विशिष्ट लेखन शैली के लिए जाने जाते थे। आधुनिक हिंदी साहित्य में उनके प्रयोगधर्मी लेखन को भी विशेष पहचान मिली। उनका पहला कविता-संग्रह लगभग जय हिंद वर्ष 1971 में प्रकाशित हुआ था। उनके प्रमुख उपन्यासों में नौकर की कमीज, दीवार में एक खिड़की रहती थी और खिलेगा तो देखेंगे शामिल हैं। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा जारी एक वक्तव्य में कहा गया था कि “उनकी कविताएं और कहानियां सरल भाषा में आम जीवन की बारीकियों को प्रस्तुत करती हैं।”

ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के समय विनोद कुमार शुक्ल ने कहा था-

“मैंने जीवन में बहुत कुछ देखा, बहुत कुछ सुना और बहुत कुछ महसूस किया, लेकिन लिख बहुत थोड़ा पाया। जब सोचता हूं कि मुझे कितना लिखना था, तो लगता है बहुत कुछ शेष रह गया। जब तक मैं जीवित रहूंगा, अपनी बाकी रचनाएं पूरी करना चाहता हूं, लेकिन शायद पूरा न कर पाऊं… इसी वजह से मैं एक बड़े द्वंद्व में हूं। मैं अपने लेखन के जरिए जीवन को आगे बढ़ाना चाहता हूं, लेकिन जीवन तेजी से अंत की ओर बढ़ रहा है और मैं इतनी तेजी से लिख नहीं पा रहा, इसलिए थोड़ा पछतावा होता है।”
उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में यह भी कहा था, “मैं यह नहीं कह सकता कि यह पुरस्कार मीठा है, क्योंकि मैं मधुमेह का मरीज हूं।”

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था व्यक्ति को मैं नहीं जानता था

हताशा को जानता था इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया

मैंने हाथ बढ़ाया मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ

मुझे वह नहीं जानता था मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था

हम दोनों साथ चले दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे

साथ चलने को जानते थे।

#विनोद_कुमार_शुक्ल

सबकी तरह लेखक को भी यहाँ से जाना है,
और लेखक दुनिया से चला भी जाएगा,
बस किसी किताब में संजोए उसके शब्द रह जायँगे हमेशा जीवित ।
मरने के बाद के इस जीवन को जीने के लिए ही,
शायद एक आम आदमी बनता है लेखक।

मानवी सजवान…

 

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