आज के दौर में AI और VFX कमाल कर रहे हैं। 74 साल के रजनीकांत को पलक झपकते ही 30 साल का बना देना अब मुश्किल नहीं रहा। बड़े पर्दे पर जब 50 साल पुराने रजनी का कूल अंदाज दिखता है, तो थिएटर में सीटियां और तालियां गूंज उठती हैं। ‘कुली’ में भी यही जादू नजर आता है।
फिल्म का एक और ट्रेंडिंग हथकंडा है — सभी रीजनल लैंग्वेज के बड़े सितारों को एक ही फिल्म में साथ लाना। लेकिन यहां सवाल उठता है — स्वैग, एक्शन और सुपरस्टार कैमियो के बीच असली कहानी कहां है? और यहीं पर डायरेक्टर लोकेश कनगराज इस बार चूक गए।
कहानी, पेचीदगी और कई किरदारों का जाल

‘कुली’ की कहानी एक कुली देवा (रजनीकांत) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने दोस्त राजशेखर (सत्यराज) की मौत की वजह जानने निकलता है। इस सफर में उसे सत्यराज की बेटी प्रीति (श्रुति हासन) साथ देती है।
जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, इसमें साइमन जेवियर (नागार्जुन), दयाल (सौबिन शाहिर), कलीशा (उपेंद्र) और दाहा (आमिर खान) जैसे किरदार जुड़ते जाते हैं। इतने सारे किरदारों और लगातार आते ट्विस्ट के कारण कई जगह स्क्रीनप्ले कमजोर और कन्फ्यूजिंग लगता है।
अंत में कहानी को अनावश्यक रूप से बड़ा दिखाने की कोशिश होती है, और लोकेश ने ये इशारा भी दे दिया है कि आगे वे आमिर और रजनीकांत को फिर साथ ला सकते हैं।
अभिनय, रजनीकांत का स्वैग, बाकी का मिलाजुला असर

फिल्म पूरी तरह रजनीकांत के इर्द-गिर्द है — एक्शन, कॉमेडी, डायलॉग डिलीवरी… सब कुछ। नागार्जुन की एक्टिंग अच्छी है लेकिन उनकी हिंदी डायलॉग डिलीवरी थोड़ी कमजोर लगती है। सौबिन शाहिर ने खतरनाक और प्रभावशाली काम किया है, जबकि सत्यराज ने सीमित रोल में ठीक-ठाक असर छोड़ा।
श्रुति हासन का रोल बहुत भागदौड़ वाला है, उन्हें एक्टिंग का ज्यादा मौका नहीं मिला। उपेंद्र के पास करने को बहुत कम है और एक्सप्रेशन भी एक जैसे हैं। आमिर खान का कैमियो मजेदार है, तो वहीं रचिता राम अपनी परफॉर्मेंस से चौंकाती हैं।
एक्शन और डायलॉग, लोकेश का ट्रम्प कार्ड
लोकेश की फिल्मों का सबसे बड़ा हाइलाइट उनका एक्शन होता है, और यहां भी उन्होंने निराश नहीं किया। कुछ सीन और डायलॉग फैंस को सीट से उठकर चियर करने पर मजबूर कर देते हैं।
एक सीन में रजनीकांत कहते हैं, “मेरी पहुंच काफी ऊपर तक है… शाहरुख और ऐश्वर्या को भी जानता हूं।” वहीं, उनके ट्रेडमार्क डायलॉग जैसे “हाथ लगा के देख” और “कर दूंगा मुन्ना” एंटरटेन करते हैं। हालांकि, कहानी को खींचने के चक्कर में कुछ जगह टेम्पो टूट जाता है और नयापन भी कम महसूस होता है।
म्यूजिक और गाने, BGM ने बचाया मोर्चा
अनिरुद्ध रविचंदर का बैकग्राउंड म्यूजिक (BGM) फिल्म की जान है, खासकर एक्शन सीन में यह रोंगटे खड़े कर देता है। पूजा हेगड़े का आइटम नंबर ‘मोनिका… मोनिका’ फिल्म की गति को रोकता है, लेकिन सौबिन शाहिर ने इसमें डांस कर जान डाल दी।
‘कुली’ कहानी के मामले में लोकेश कनगराज की सबसे कमजोर और कन्फ्यूजिंग फिल्म कही जा सकती है। लेकिन रजनीकांत के 50 साल पूरे होने का जश्न, उनका स्वैग, एक्शन सीक्वेंस और स्टार पावर इसे एक बार देखने लायक बना देते हैं।
अगर आप रजनी के फैन हैं या साउथ सिनेमा के ओवर-द-टॉप एंटरटेनमेंट के शौकीन हैं, तो यह फिल्म आपको निराश नहीं करेगी। 15 अगस्त की छुट्टी या वीकेंड पर दोस्तों के साथ देखी जा सकती है।

