देहरादून: उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकगायक पवन सेमवाल का एक गीत इन दिनों विवादों के घेरे में है। गीत में राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का नाम आने के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई और तमाम तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। विवाद बढ़ता देख पुलिस ने यह गीत सोशल मीडिया से हटा दिया, लेकिन मामला यहीं नहीं थमा। अब एक महिला द्वारा पवन सेमवाल को सरेआम गला काटने की धमकी देने का वीडियो वायरल हो गया है, जिसके बाद मामला और गंभीर हो गया है।
बताया जा रहा है कि पवन सेमवाल ने कुछ दिन पहले एक गीत सोशल मीडिया पर जारी किया था, जिसमें उन्होंने ‘धामी’ शब्द का प्रयोग करते हुए राज्य की राजनीतिक स्थिति पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी की थी। यह गीत मुख्यमंत्री के नाम को लेकर था, जिस पर सत्ताधारी दल के समर्थकों ने आपत्ति जताई और भारी विरोध हुआ। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए गीत को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से हटवा दिया।
इस विवाद के बीच एक महिला, जो स्वयं को समाजवादी विचारधारा से जुड़ा बताती है और जिस पर पहले से ही 28 आपराधिक मामले दर्ज होने की बात सामने आई है, ने खुलेआम मीडिया के सामने लोकगायक का गला काटने की धमकी दे डाली। इस बयान का वीडियो वायरल होते ही पूरे उत्तराखंड में आक्रोश फैल गया।
उत्तराखंड क्रांति दल ने इस महिला के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की है। पार्टी की ओर से देहरादून के पटेल नगर और ऋषिकेश थाने में अलग-अलग तहरीरें दी गई हैं। तहरीर में कहा गया है कि यह महिला कानून व्यवस्था को खुली चुनौती दे रही है और इसका बयान समाज में हिंसा भड़काने वाला है। उत्तराखंड क्रांति दल ने यह भी कहा कि अगर पवन सेमवाल के साथ कोई अनहोनी होती है, तो इसकी जिम्मेदार यही महिला होगी।
तहरीर में महिला के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं 351 (धमकी देना), 352 (हमले की आशंका), 353 (सरकारी कार्य में बाधा) और साइबर अपराध व बीएसएन अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज करने की मांग की गई है। संगठन ने पुलिस से आग्रह किया है कि महिला के खिलाफ स्वतः संज्ञान (suo moto) लेते हुए तुरंत कार्रवाई की जाए।
यह विवाद उत्तराखंड में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक सहिष्णुता और कानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन और पुलिस इस प्रकरण में निष्पक्षता के साथ क्या कार्रवाई करती है और क्या इस तरह के उग्र और हिंसक बयानों को लेकर कोई ठोस उदाहरण पेश किया जाता है। उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान और लोकसंस्कृति पर ऐसी घटनाओं का क्या असर पड़ेगा, यह भी सोचने का विषय है।
