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उत्तरकाशी आपदा: हर पत्थर के नीचे जिंदगी की तलाश, छठे दिन भी जारी जंग..हर सांस के लिए दौड़ रही जिंदगी

मलबे के बीच उम्मीद का सफर – छह दिन बाद भी जारी खोज और बचाव
इंसानियत की पहचान – वर्दीधारी ‘मसीहा’ और एक ही लक्ष्य—जिंदगी

उत्तरकाशी: धराली की शांत घाटियां, जहां कभी सिर्फ नदी की कलकल और हवा की सरसराहट सुनाई देती थी, आज मशीनों की गड़गड़ाहट, हेलीकॉप्टरों के शोर और लोगों की दबी हुई चीखों से गूंज रही हैं। उत्तरकाशी की धराली आपदा का आज छठवां दिन है, लेकिन राहत-बचाव टीमें अब भी बिना थके मलबे में जिंदगी की तलाश में जुटी हैं।

छह दिन पहले आई आपदा ने यहां का चेहरा ही बदल दिया। जहां घर थे, वहां अब पत्थरों के ढेर हैं। जहां खेत थे, वहां मलबे और रेत का सन्नाटा है। लेकिन इस खामोशी के बीच, उत्तराखंड पुलिस, सेना, एसडीआरएफ, फायर सर्विस और अन्य एजेंसियां एक उम्मीद को जिंदा रखे हुए हैं—कि शायद किसी मलबे के नीचे अब भी कोई सांसें ले रहा हो।

मातली में बनाए गए एयरबेस से आठ हेलीकॉप्टर लगातार उड़ान भर रहे हैं। अब तक 260 से ज्यादा फेरे लग चुके हैं—कभी राशन लेकर, कभी दवाई लेकर, और कभी घायल या फंसे लोगों को लेकर। चिनूक, एमआई-17, एएलएच और चीता जैसे हेलीकॉप्टर आसमान में जीवन की डोर बुन रहे हैं। हर्षिल से दो युवा तीर्थयात्रियों को सुरक्षित निकालकर चिन्यालीसौड़ लाया गया, फिर वायुसेना विमान से उन्हें जौलीग्रांट पहुंचाया गया। उनकी आंखों में सिर्फ आंसू और जुबान पर सिर्फ एक शब्द था—”धन्यवाद”।

सोशल मीडिया पर फैली एक पोस्ट ने प्रशासन का दिल दहला दिया—महाराष्ट्र के 24 लोगों के लापता होने की खबर। पुलिस ने तुरंत जांच शुरू की। खोजबीन के बाद पता चला कि सभी सुरक्षित हैं और उन्हें एयरलिफ्ट कर हरिद्वार पहुंचा दिया गया। यह राहत की सांस पूरे धराली में महसूस हुई।

राहत-बचाव में अब तकनीक और संवेदनाएं दोनों साथ चल रही हैं। ड्रोन से ऊंचाई पर स्थित संभावित जगहों की तलाश हो रही है, तो जमीन पर स्नीफर डॉग्स हर पत्थर, हर झाड़ी, हर रेत के ढेर को सूंघकर उम्मीद खोज रहे हैं। पुलिस और एसडीआरएफ नदी किनारे पड़े मलबे और झाड़ियों में हाथों से खोद-खोदकर तलाश कर रहे हैं—मानो वे पत्थरों से कह रहे हों, “अगर तुम्हारे नीचे कोई है, तो हमें बता दो।”

धराली में एक पुलिस कंट्रोल रूम 24×7 चल रहा है। वायरलेस सेट से हर सेकंड अपडेट जा रहा है—”यहां एक व्यक्ति मिला”, “यहां मलबा ज्यादा है”, “यहां हेलीकॉप्टर भेजना है”… हर संदेश के पीछे कई जिंदगी की धड़कनें जुड़ी हैं।

धराली आपदा सिर्फ एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि यह इंसानियत की परीक्षा है। यहां वर्दीधारी जवान, फायरमैन, डॉक्टर, पायलट—सब एक ही पहचान में बदल गए हैं—‘मसीहा’। और मलबे में दबा हर व्यक्ति, चाहे स्थानीय हो या यात्री, सभी के लिए बराबर है।

छह दिन बीत चुके हैं, लेकिन धराली में अभी भी उम्मीद जिंदा है। शायद अगले पत्थर के नीचे, अगले मोड़ पर, अगले ढेर के भीतर… कोई सांस ले रहा हो। और जब तक वह सांस है, तब तक यह जंग जारी रहेगी—जीवन बचाने की जंग।

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