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UKSSSC पेपर लीक विरोध में गूंजे ‘फलीस्तीन जिंदाबाद’ के नारे, प्रदर्शन को मिला राजनीतिक रंग

शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता की मांग से भटका आंदोलन, सुरक्षा एजेंसियां सतर्क
युवा बने निशाने पर, संगठनों की राजनीतिक घुसपैठ से परीक्षा अभ्यर्थियों में असमंजस
सरकार ने दी रोजगार उपलब्धियों की दुहाई, विपक्ष ने साधा निशाना

देहरादून: उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) पेपर लीक कांड को लेकर चल रहा विरोध आंदोलन रविवार को नए मोड़ पर पहुंच गया। परेड ग्राउंड स्थित धरना स्थल पर ‘दिशा संगठन’ की एंट्री के बाद प्रदर्शन में ‘फलीस्तीन जिंदाबाद’ जैसे नारे गूंजने लगे। अब तक केवल परीक्षा रद्द करने और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया की मांग कर रहे युवाओं के आंदोलन को अचानक राजनीतिक रंग मिल गया है।

युवा आक्रोश और बदलता स्वरूप

पेपर लीक प्रकरण से आहत हजारों अभ्यर्थी लंबे समय से आंदोलनरत हैं। उनका स्पष्ट उद्देश्य था—भर्ती परीक्षाओं को भ्रष्टाचार मुक्त और पारदर्शी बनाना। लेकिन अब मंच पर लगे ‘फलीस्तीन जिंदाबाद’ और ‘हमें चाहिए आज़ादी’ जैसे नारों ने आम उम्मीदवारों को असमंजस में डाल दिया है। विरोध में शामिल कई युवाओं का कहना है कि उनका मकसद केवल नौकरी और न्याय है, पर कुछ संगठन इसे अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

राजनीतिक हस्तक्षेप के संकेत

सुरक्षा एजेंसियों ने इस पूरी गतिविधि पर कड़ी नजर रखनी शुरू कर दी है। सूत्र बताते हैं कि जिस तरह नेपाल जैसे हालात पैदा होने की बातें प्रदर्शनकारियों में उठीं, उससे साफ है कि आंदोलन में बाहरी संगठनों की राजनीतिक घुसपैठ हो चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे नारे युवाओं के वास्तविक मुद्दे—शिक्षा और रोजगार—को पीछे धकेल देते हैं।

शिक्षा और रोजगार पर सरकार का पक्ष

उत्तराखंड संस्कृति साहित्य एवं कला परिषद की उपाध्यक्ष मधु भट्ट ने युवाओं से अपील की कि वे किसी भी तरह के देश-विरोधी षड्यंत्र का हिस्सा न बनें। उन्होंने सरकार की उपलब्धियां गिनाते हुए कहा कि बीते चार वर्षों में लोक सेवा आयोग, UKSSSC और अन्य आयोगों के माध्यम से 25 हजार युवाओं को सरकारी नौकरी दी गई है। इसके अलावा, मुख्यमंत्री के प्रयासों से एक लाख करोड़ रुपये का निवेश राज्य में आया है और 81 हजार से अधिक नौकरियों का सृजन हुआ है।

विपक्ष का पलटवार..

वहीं विपक्ष ने आरोप लगाया है कि सरकार पेपर लीक मामले में कड़ी कार्रवाई करने में नाकाम रही और अब आंदोलन को राजनीतिक रंग देकर असली मुद्दे से ध्यान भटकाया जा रहा है। उनका कहना है कि युवाओं को रोज़गार देने के दावों से ज़्यादा ज़रूरत पारदर्शी व्यवस्था और निष्पक्ष जांच की है।

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