जांच की दिशा, न्याय की गति और सत्ता के चरित्र पर उठते सवाल
देरी, चुप्पी और संदेह ने जनता के भरोसे को पहुंचाई चोट
संविधान की कसौटी पर खड़ा है शासन का नैतिक साहस
देहरादून: अंकिता भंडारी हत्याकांड ने उत्तराखंड सरकार के सामने केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि गहरे नैतिक और संवैधानिक सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला अब एक अपराध की जांच तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि शासन की निष्पक्षता, संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी की परीक्षा बन चुका है। जनता की चिंता केवल एक बेटी की हत्या नहीं है, बल्कि उस प्रक्रिया को लेकर है जिसमें सच्चाई को देर से, अधूरी या नियंत्रित रूप में सामने लाने की कोशिश दिखाई दी।
“अगर धन चला जाए तो कुछ नहीं जाता, अगर स्वास्थ्य चला जाए तो बहुत कुछ चला जाता है, लेकिन अगर चरित्र चला जाए तो सब कुछ चला जाता है।”- खुर्शीद अहमद सिद्दीकी
शुरुआती जांच में लापरवाही, सबूतों के नष्ट होने के आरोप और प्रभावशाली लोगों पर चुप्पी ने जनता के मन में संदेह पैदा किया है। जब न्याय की प्रक्रिया धीमी या पक्षपातपूर्ण प्रतीत होती है, तो केवल एक परिवार नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर भरोसा डगमगाने लगता है। ऐसे मामलों में मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं होते, न्याय को स्वतंत्र, पारदर्शी और निडर दिखना चाहिए।
भारतीय संविधान कानून के सामने समानता और जीवन व सम्मान के अधिकार की गारंटी देता है। ये राज्य के लिए केवल आदर्श नहीं, बल्कि अनिवार्य दायित्व हैं। एक युवा महिला की हत्या और उस पर शासन की संदिग्ध प्रतिक्रिया ने संवैधानिक शासन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
लोकतंत्र सवाल पूछने से कमजोर नहीं होता, बल्कि तब कमजोर होता है जब सत्ता जवाब देने से बचती है। जनता का भरोसा तभी लौटेगा जब निष्पक्ष जांच होगी, दोषियों पर कार्रवाई होगी और सरकार सच्चाई को सामने आने देने का साहस दिखाएगी। यदि शासन का असली पैमाना चरित्र है, तो यह समय ईमानदार और दृढ़ कदम उठाने का है।
