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उत्तराखंड: ‘देश का भविष्य’..उफनती नदी पार कर पहुंचती है शिक्षा, बरसात में जान जोखिम में डाल स्कूल जाते बच्चे

डिजिटल इंडिया’ के दौर में चुकुम गांव की हकीकत – उफनती नदी पार कर पहुंचती है शिक्षा.
जहां हर साल हेलीकॉप्टर से राहत पहुंचती है, वहां अब तक नहीं बना एक पुल.
1993 से मांग, 2025 में भी अधर में विस्थापन, चुकुम गांव की बदहाली जारी.

रामनगर (कैलाश सुयाल): उत्तराखंड सरकार जहाँ विकास और डिजिटलीकरण के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं नैनीताल जिले के रामनगर तहसील में कोसी नदी पार बसा आपदाग्रस्त राजस्व गांव चुकुम इन दावों को आइना दिखा रहा है। जंगलों के बीच बसा यह गांव हर साल बरसात में मुख्यधारा से कट जाता है और ग्रामीणों की जिंदगियों पर संकट गहरा जाता है।

गांव की दूरी रामनगर से लगभग 24 किलोमीटर है और यहां करीब 120 परिवार रहते हैं। लेकिन तीन दशकों से पुल और विस्थापन की मांग कर रहे इन ग्रामीणों को केवल आश्वासन ही मिले हैं।

हर दिन जान जोखिम में डालकर स्कूल जाते हैं बच्चे:

चुकुम गांव के बच्चों को रोजाना उफनती कोसी नदी पार कर करीब 3 किलोमीटर दूर मोहान स्थित राजकीय इंटर कॉलेज जाना पड़ता है। बरसात के दिनों में नदी पार करना किसी जोखिम भरे मिशन से कम नहीं होता। बच्चे बैग सिर पर उठाकर, एक-दूसरे का हाथ थामकर नदी पार करते हैं। छोटी सी चूक जान पर भारी पड़ सकती है।

बच्चे बताते हैं कि उनके बैग में एक जोड़ी अतिरिक्त कपड़े और जूते होते हैं। नदी पार कर पेड़ों की आड़ में कपड़े बदलने के बाद वे स्कूल जाते हैं। गांव में सिर्फ कक्षा 1 से 10वीं तक की पढ़ाई होती है, जिससे आगे की शिक्षा के लिए मोहान जाना जरूरी हो जाता है।

वर्ष 2021 में हेलीकॉप्टर से पहुंचानी पड़ी थी राहत सामग्री:

हर साल बरसात में कोसी नदी का जलस्तर बढ़ने से गांव का संपर्क ब्लॉक, तहसील और जिला मुख्यालय से कट जाता है। वर्ष 2021 में हालात इतने बिगड़ गए थे कि प्रशासन को हेलीकॉप्टर से खाद्य सामग्री भेजनी पड़ी थी। ग्रामीणों को बारिश शुरू होने से पहले जरूरी सामान जुटाकर रखना पड़ता है, क्योंकि कुछ भी बाहर से लाना संभव नहीं होता।

विस्थापन की मांग, लेकिन समाधान नहीं:

ग्रामीणों ने 1993 से विस्थापन की मांग उठाई है। 2016 में एक बार सर्वे हुआ, लेकिन कोई ठोस कार्यवाही नहीं हो सकी। पहले केलाखेड़ा (जसपुर) में जमीन चिन्हित की गई थी, जिसे ग्रामीणों ने अस्वीकार कर दिया। अब रामनगर के आमपोखरा रेंज के पास एक नई जगह पर पुनर्वास की प्रक्रिया प्रगति में है।

उप जिलाधिकारी प्रमोद कुमार ने बताया कि वैकल्पिक मार्ग (कुनखेत से चुकुम) का सर्वे हुआ है, जो जंगल से होकर गुजरता है और मानसून में बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है। बावजूद इसके ट्रैक्टर, जेसीबी और राफ्टिंग की व्यवस्थाएं की गई हैं ताकि राहत कार्य संभव हो सके।

राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी:

सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र शर्मा का कहना है कि “हर साल सिर्फ बैठकें होती हैं, वादे किए जाते हैं, लेकिन कोई क्रियान्वयन नहीं। पंचायत चुनाव में प्रशासन पोलिंग पार्टी पहुंचाने की योजना बनाता है, लेकिन यह नहीं सोचता कि यहां के बच्चे हर दिन स्कूल कैसे जाते हैं। यह राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है जिसकी कीमत ग्रामीण चुका रहे हैं।”

चुकुम गांव केवल एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि उन सैकड़ों गांवों की प्रतीक है जहाँ “विकास” अब भी सिर्फ कागज़ों पर मौजूद है। स्कूली बच्चों का साहस और ग्रामीणों का संघर्ष सिस्टम की उदासीनता पर एक करारा तमाचा है।

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