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उत्तराखंड की स्वास्थ्य सेवाओं पर फिर उठे सवाल, इलाज न मिलने से फौजी के मासूम बेटे की मौत, सीएम धामी ने दिए जांच के आदेश

फौजी के बेटे की मौत से उत्तराखंड में मचा हड़कंप, सीएम ने कुमाऊं आयुक्त को दिए जांच आदेश.

देहरादून: उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में इलाज के अभाव में एक फौजी के डेढ़ साल के बेटे की मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। चमोली जिले के चिडंगा गांव निवासी सैनिक दिनेश चंद्र जोशी के बेटे शुभांशु की अचानक तबीयत बिगड़ने पर परिजन उसे पहले ग्वालदम अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन वहां इलाज नहीं मिला। हालत बिगड़ती देख परिजन बच्चे को बैजनाथ अस्पताल लेकर गए, जहां से बागेश्वर जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया।

बागेश्वर जिला अस्पताल में भी बच्चे की गंभीर हालत को देखते हुए उसे हल्द्वानी रेफर किया गया, लेकिन संकट तब और गहरा गया जब परिजनों को समय पर 108 एंबुलेंस तक उपलब्ध नहीं हो सकी। मजबूरी में जम्मू-कश्मीर में तैनात फौजी पिता ने जिलाधिकारी से संपर्क किया, जिसके बाद देर रात करीब साढ़े 9 बजे एंबुलेंस मिली। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और रास्ते में ही मासूम शुभांशु की मौत हो गई।

इस दर्दनाक घटना के बाद सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे पहले स्वास्थ्य मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने मामले में सख्ती दिखाई, वहीं अब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी इसे बेहद संवेदनशील प्रकरण बताते हुए सख्त रुख अपनाया है। मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि “बागेश्वर में एक मासूम बच्चे की चिकित्सा में लापरवाही से मृत्यु का समाचार अत्यंत पीड़ादायक और दुर्भाग्यपूर्ण है।”

सीएम धामी ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा अपने कर्तव्यों में लापरवाही बरती गई है। उन्होंने मामले की जांच के लिए कुमाऊं आयुक्त को तत्काल आदेश जारी किए हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी भी स्तर पर लापरवाही या उदासीनता सामने आती है, तो दोषियों के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई की जाएगी।

यह मामला केवल एक बच्चे की मौत का नहीं, बल्कि राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी हकीकत को उजागर करता है। पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली और समय पर चिकित्सा सहायता न मिलना आम बात बन चुकी है। अब देखना होगा कि मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए जांच आदेशों के बाद इस प्रकरण में कौन-कौन जिम्मेदार ठहराए जाते हैं और राज्य सरकार इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाती है।

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