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रिश्तों की परिभाषा बदलती सोशल मीडिया

आज का समाज ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है जहां एक तरफ तकनीकी प्रगति ने जीवन को सहज और तेज बना दिया है, वहीं यही तकनीक धीरे-धीरे सामाजिक ताने-बाने को चुपचाप खोखला कर रही है। सोशल मीडिया, जो कभी सूचना और संपर्क का सशक्त माध्यम था, आज ऐसा नशा बन चुका है जिसने परिवार, संबंध और मानसिक स्वास्थ्य, तीनों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

पहले के समय में संवाद का अर्थ था बैठ कर बात करना, साथ हंसना, रोना, बहस करना और समझना। आज यह सब कुछ ‘टाइप’ और ‘स्क्रॉल’ में बदल गया है। बच्चे हों या बुजुर्ग, महिलाएं हों या पुरुष, सबके हाथ में स्मार्टफोन हैं, और निगाहें स्क्रीन पर। कभी जो बातें रसोई, आंगन या बैठक में होती थीं, आज ‘स्टेटस अपडेट’, ‘रील’ या ‘ट्वीट’ में समा गई हैं। जिस रफ्तार से इंटरनेट की पहुंच और स्मार्टफोन का प्रसार हुआ है, उसी रफ्तार से हमारी असल दुनिया सिमटती जा रही है। सोशल मीडिया ने रिश्तों की परिभाषा बदल दी है अब दोस्त वो हैं, जिनके पोस्ट पर हम हार्ट भेजते हैं, परिवार वो है जिसके मैसेज को हमने ‘सीन’ किया हो, और सुख-दुख वो है जो हमने ‘स्टोरी’ पर साझा किया हो। बच्चे अब खेल के मैदान में नहीं, मोवाइल स्क्रीन पर ‘गेमिंग’ कर रहे हैं। स्कूल से लौट कर मां-बाप से बात करने की बजाय इंस्टाग्राम खोलते हैं। किशोरावस्था, जो कभी आत्म-अन्वेषण और सामाजिक अनुभवों का समय हुआ करता था, आज सेल्फी, फिल्टर और वर्चुअल पहचान की दौड़ में उलझ गया है।

सोशल मीडिया के इस अति-उपयोग ने ऐसा द्वंद्व पैदा किया है जहां व्यक्ति दिखने में बहुत व्यस्त है पर भीतर से बेहद अकेला है। रिश्ते जो कभी जीवन का आधार होते थे, अब ‘टैग’ और ‘मेंशन’ में बदल चुके हैं। पति-पत्नी एक ही छत के नीचे रहते हैं, लेकिन बातचीत व्हाट्सएप पर होती है। मां-बाप बच्चों को खाना परोसते हैं, और बच्चे खाने से पहले उसकी तस्वीर खींच कर पोस्ट करते हैं। यह आदत लत बन चुकी है। सुबह उठते ही सोशल मीडिया चेक करना, रात को सोने से पहले स्क्रॉल करना, हर क्षण को लाइव करना या कम से कम फोन में कैद करना। यह व्यवहार अब केवल समय की बर्बादी नहीं, बल्कि मानसिक विकारों का बीज भी बन चुका है।

डिजिटल लाइफस्टाइल ने न केवल नींद, आहार, एकाग्रता को प्रभावित किया है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डाला है। सोशल मीडिया पर दिखने वाली ‘परफेक्ट जिंदगी’ का निरंतर सामना आम इंसान को हीन भावना से भर देता है। दूसरों की सफलता, सुंदरता, यात्रा और जीवनशैली की तस्वीरें देख कर व्यक्ति अपने जीवन को तुच्छ समझने लगता है। यही वह क्षण होता है जब तनाव, अवसाद और आत्मग्लानि जैसे विकार जन्म लेने लगते हैं। खासकर किशोरों और युवाओं में यह प्रभाव और भी तीव्र है। सोशल मीडिया पर मिलने वाले लाइक्स, कमेंट्स और फॉलोअर्स ने आत्ममूल्यांकन का नया पैमाना बना दिया है। एक पोस्ट पर कम लाइक आए तो आत्म सम्मान को ठेस लगती है, ट्रोलिंग हो जाए तो महीनों तक अवसाद की स्थिति बनी रहती है।

इस प्लेटफॉर्म पर ‘फेक आईडेंटिटी’ और ‘वर्चुअल ग्लैमर’ का जाल इतना घना हो गया है कि लोग वास्तविकता से कटते जा रहे हैं। एक तरफ जहां व्यक्ति दूसरों को दिखाने के लिए महंगे कपड़े, कारें और कैफे में फोटो पोस्ट करता है, वहीं असल जिंदगी में वह कर्ज और तनाव से घिरा होता है। परिवारों में संवाद की जगह अब संदेह, दूरी और झगड़े ने ले ली है। शादीशुदा जिंदगियों में सोशल मीडिया पर गैरजरूरी बातचीत और अफेयर्स ने तलाक के मामलों में वृद्धि की है। बच्चों में चिड़िचड़ापन, सोशल आइसोलेशन और एकांतप्रियता बढ़ी है। बुजुर्ग अपने ही घर में उपेक्षित महसूस करते हैं क्योंकि बच्चे मोबाइल में खोए रहते हैं। सोशल मीडिया पर झूठे आदर्शों और हानिकारक कंटेंट की भरमार भी है। लड़िकयों को परफेक्ट फिगर के दबाव में डाला जाता है, युवाओं को सफलता के झूठे मॉडल दिखा कर भ्रमित किया जाता है, और छोटे बच्चे हिंसक या भ्रामक गेम्स में उलझ जाते हैं। सोशल मीडिया का नया नशा तभी टूटेगा जब हम आत्मनियंत्रण, संवाद और समझदारी से इसे अपनाएंगे।

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