हरिद्वार: धर्मनगरी हरिद्वार में फाल्गुन मास के रंगोत्सव के बीच नागा साधुओं और संत समाज ने होली को विशेष आध्यात्मिक स्वरूप दिया। माया देवी मंदिर प्रांगण में संतों ने पारंपरिक ढंग से पंचगव्य तैयार कर उसी से होली खेली और सनातन संस्कृति के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।
संतों ने गाय के दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र से पंचगव्य बनाकर पहले विधि-विधान से पूजन किया, तत्पश्चात एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर शुभकामनाएं दीं। ढोल-नगाड़ों और भजन-कीर्तन के बीच पूरा परिसर ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष से गूंज उठा। नागा संन्यासी पारंपरिक अंदाज में झूमते नजर आए।
जगद्गुरु शंकराचार्य राजराजेश्वराश्रम महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति और उसके संसाधनों के प्रति सम्मान की भावना प्राचीन काल से रही है। पंचगव्य की होली उसी परंपरा का जीवंत प्रतीक है, जो समाज को अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश देती है।

वहीं जूना अखाड़ा के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक श्रीमहंत हरिगिरि महाराज ने बताया कि फागुन मास की रंगभरी एकादशी भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित होती है। संत समाज इसी अवसर पर पंचगव्य से होली खेलकर भगवान को प्रसन्न करने की परंपरा निभाता है। उन्होंने कहा कि गाय के गोबर का वैज्ञानिक महत्व भी है, जो वातावरण को शुद्ध करने में सहायक माना जाता है।
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत रविंद्रपुरी महाराज ने कहा कि पंचगव्य से होली खेलना सनातन संस्कृति और प्रकृति सम्मान का प्रतीक है। उन्होंने गाय को राष्ट्रमाता का दर्जा दिए जाने की भी बात कही।
गौरतलब है कि निरंजनी अखाड़ा और जूना अखाड़े में नागा संन्यासी निवास करते हैं, जिन्हें सनातन धर्म का प्रमुख वाहक माना जाता है। जहां एक ओर बरसाना की लठमार होली और मथुरा की फूलों की होली विश्वप्रसिद्ध है, वहीं हरिद्वार में संतों की पंचगव्य होली आस्था, परंपरा और पर्यावरण चेतना का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है।
