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डिजिटल इंडिया की चमक और सिलिंडर के लिए कतारें, क्या यही है डिजिटल इंडिया ?

एक तरफ हम चांद पर पानी खोजरे है और दूसरी तरफ हम 80 के दशक वाली तस्वीरें दिख रही है।
क्या यही है हिंदुस्तान की किस्मत।

भारत आज डिजिटल क्रांति की बात करता है। हाथों में तेज इंटरनेट, मोबाइल ऐप्स और ऑनलाइन सेवाओं का जाल बिछ चुका है। एक क्लिक में गैस बुकिंग हो जाती है, मोबाइल स्क्रीन पर “डिलीवरी बुक्ड” का मैसेज भी तुरंत आ जाता है। लेकिन जब वही गैस सिलिंडर घर तक पहुंचने में हफ्तों लगा देता है, तब यह सवाल उठता है- क्या यही है डिजिटल इंडिया का सपना?

एक तरफ लोगों के हाथ में 5G फोन है, दूसरी तरफ वही लोग कंधे पर गैस सिलिंडर उठाए लंबी-लंबी कतारों में खड़े दिखाई देते हैं।
कुछ साल पहले जब उज्ज्वला योजना शुरू हुई थी, तब उम्मीद जगी थी कि देश का हर घर धुएं से मुक्त होगा। लाखों गरीब परिवारों को गैस कनेक्शन मिला और रसोई में धुएं की जगह साफ-सुथरी लौ ने ले ली। लेकिन आज हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं कि कई परिवार फिर से मजबूरी में लकड़ी और धुएं वाली रसोई की तरफ लौटते नजर आते हैं। सवाल यह नहीं कि योजनाएं बनीं या नहीं, सवाल यह है कि क्या उन योजनाओं का लाभ लगातार और सुचारू रूप से लोगों तक पहुंच पा रहा है?

लेकिन सवाल यह भी है कि जब भारत खुद को विश्वगुरु बनने की राह पर बताता है, तो क्या उसके पास इतने संसाधन और व्यवस्थाएं नहीं होनी चाहिए कि देश के नागरिकों की बुनियादी जरूरतें आसानी से पूरी हो सकें? क्या एक गैस सिलिंडर जैसी जरूरत के लिए लोगों को घंटों कतारों में खड़ा होना ही पड़ेगा?

दुनिया के मंच पर भारत की ताकत और उपलब्धियां लगातार बढ़ रही हैं। अंतरिक्ष में नए-नए कीर्तिमान बन रहे हैं, चांद पर पानी की खोज की जा रही है, तकनीक में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन उसी समय जब आम आदमी एक गैस सिलिंडर के लिए घंटों लाइन में खड़ा नजर आता है, तो यह सवाल उठना लाजिमी हो जाता है कि क्या विकास की यह रफ्तार हर घर तक समान रूप से पहुंच रही है?

एक और सवाल भी अक्सर लोगों के मन में आता है- इन लंबी कतारों में ज्यादातर गरीब और मध्यम वर्ग के लोग ही क्यों दिखाई देते हैं? अगर यह समस्या सबके लिए समान है, तो फिर अमीर वर्ग इन लाइनों में कम क्यों नजर आता है? क्या व्यवस्था ऐसी है कि असुविधा का बोझ सबसे ज्यादा उसी वर्ग पर पड़ता है जो पहले से ही संघर्ष कर रहा है?

आज सोशल मीडिया और रील्स में भारत की एक चमकदार तस्वीर दिखाई देती है तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, नई तकनीक, और बड़े-बड़े सपने। लेकिन जमीन पर खड़ी कतारें यह याद दिलाती हैं कि विकास की असली परीक्षा वहीं होती है, जहां आम आदमी की जरूरतें पूरी होती हैं।

 

मानवी सजवान

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